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प्राक्कथन

          विकसित समाज अपने कुछ आदर्शों पर आधारित रहता है । ये आदर्श कौन से हैं, यह उस समाज में उपलब्ध दन्तकथाओं से परिलक्षित होता है । इन दन्तकथाओं का संकलन जिन ग्रन्थों में होता है, उन्हें पुराण या अंग्रेजी में माइथालाजी कहा जाता है । लेकिन ऐसा नहीं है कि यह ग्रन्थ केवलमात्र समाज में प्रचलित व्यवहारों का, नियमों का दर्पण मात्र ही हों । इन कथाओं के पीछे पर्दे में कुछ योग, विज्ञान, दर्शन आदि के गम्भीर तथ्य भी छिपे रहते हैं, ऐसी परम्परागत रूप से मान्यता रही है । भारत में जो मुख्य रूप से १८ पुराणों का संग्रह प्रसिद्ध है, उसके बारे में तो यह भी मान्यता है कि वह वेदों की परोक्ष रूप से व्याख्याएं प्रस्तुत करते हैं, वेदों के जिन शब्दों का अर्थ ज्ञात नहीं है, उन शब्दों के अर्थ कथाओं के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं । वैदिक शब्दों के अर्थोंको समझने के लिए आज एकमात्र यास्क का निरुक्त ही उपलब्ध है और उसमें वेद के कुछ एक शब्द ही लिए गए हैं । उन शब्दों की व्याख्या भी ऐसी है जो सामान्य रूप से बोधगम्य नहीं है । दूसरी ओर, पुराणों की कथाएं सर्वसुलभ हैं और उन कथाओं के रहस्यों को समझ कर शब्दों के मूल अर्थ तक पहुंचा जा सकता है । लेकिन यह मानना होगा कि इस दिशा में गंभीर प्रयासों की आवश्यकता है ।

          पुराणों ने भारतीय समाज के लिए एक व्यवहार शास्त्र भी प्रस्तुत किया है । पुत्र का माता - पिता के साथ, पत्नी का पति के साथ, गुरु का शिष्य के साथ, राजा का प्रजा के साथ, भृत्य का स्वामी के साथ व्यवहार कैसा हो, यह सब पुराणों में उपलब्ध है । समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि ४ वर्णों की कल्पना की गई है जिनके अलग - अलग कर्तव्य निर्धारित किए गए हैं । यह वर्ण व्यवस्था उचित है या नहीं, इसमें विवाद नहीं हो सकता, लेकिन यह जन्म के आधार पर हो या कर्म के आधार पर, इस विषय में लगता है पुराणों में भी अन्तर्विवाद है । कहीं जन्म के आधार पर मानी गई है, कहीं कर्म को प्रधानता दी गई है, कहीं जन्म से प्राप्त वर्ण को कर्मों द्वारा परिवर्तित करते हुए दिखाया गया है ।

          समाज में लोगों की श्रद्धा को किस ओर उन्मुख किया जाए, इसका भी प्रयास पुराणों में किया गया है । पुराणों में विभिन्न देवताओं के पूजन - अर्चन की विधि का विस्तार से वर्णन है । मूर्ति निर्माण में देवता की मूर्ति कैसी बनानी चाहिए, उसकी प्रतिष्ठा के लिए मन्दिर का स्वरूप कैसा होना चाहिए, यह सब पुराणों में वास्तुकला के अन्तर्गत मिलता है । पुराणों में प्रस्तुत देवताओं की साकार मूर्तियों का स्वरूप बहुत लम्बे काल से विवाद का विषय रहा है, विदेशी आक्रमणकारियों की घृणा का पात्र बना है, लेकिन अनुमान यह है कि वैदिक साहित्य में देवताओं के जिन गुणों की व्याख्या शब्दों में की गई है, पुराणों में उसका सरलीकरण करते हुए उसे एक साकार रूप दिया गया है ।

          पुराणों में दन्तकथाओं में अन्तर्निहित राजाओं की वंशावलियां भी प्राप्त होती हैं और काल निर्धारण के संदर्भ में आधुनिक पुरातत्त्वविदों के बीच यह वंशावलियां विवाद का विषय रही हैं । कहा जाता है कि भूगर्भ से प्राप्त शिलालेखों से राजाओं का जो कालनिर्धारण होता है, वह पौराणिक आधार पर किए गए कालनिर्धारण से मेल नहीं खाता । अतः पुराणों की कथाओं के पात्र किसी वास्तविक घटना के आधार पर लिए गए हैं या काल्पनिक प्रस्तुति हैं, इसका निर्णय करना कठिन है ।

          पुराणों में भूगोल का विस्तृत वर्णन मिलता है । लेकिन यह भूगोल कहीं तो पृथिवी के आधुनिक मानचित्र से मेल खाता है, कहीं नहीं । ऐसा लगता है कि भूगोल के इस विस्तृत वर्णन के पीछे पुराण प्राचीन भारतीय विचारधारा को प्रस्तुत कर रहे हैं ।

          पुराणों में मुगलकालीन तथा अंग्रेजों के शासनकाल तक के राजाओं के नाम भी उपलब्ध होते हैं । भविष्य पुराण में तो यह वर्णन अतिशयोक्ति तक पहुंच गया है और कहा जाता है कि इस पुराण का मूल रूप उपलब्ध न होने के कारण कुछ विद्वानों ने नई कल्पना करके इसकी क्षतिपूर्ति की है । तथ्य चाहे कुछ भी रहा हो, लेकिन इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि यह पुराण भी वेद व्याख्या प्रस्तुत करने में सबसे अग्रणी है और इसका जो अंश कल्पित प्रतीत होता है, वह भी बहुत सारगर्भित है ।

          भारतीय समाज का आधार होते हुए भी पुराणों के मन्थन के उतने गम्भीर प्रयास नहीं किए गए हैं जितने अपेक्षित थे । श्रीमती राधा गुप्ता, श्रीमती सुमन अग्रवाल व श्री विपिन कुमार द्वारा प्रस्तुत पुराण विषय अनुक्रमणिका के इस भाग में अ से लेकर ह तक के पुराणों के विषयों और नामों का संकलन किया गया है । आशा है यह ग्रन्थ अध्येताओं को, चाहे वह किसी भी क्षेत्र के हों, नई सामग्री प्रस्तुत करेगा । इससे पहले इन्हीं लेखकों द्वारा २ ग्रन्थ ° पुराण विषय अनुक्रमणिका ° ( वैदिक टिप्पणियों सहित ) प्रकाशित किए जा चुके हैं, लेकिन टिप्पणी लेखन का कार्य बहुत बृहत् है और यह उचित ही है कि अनुक्रमणिका को बिना टिप्पणियों के ही प्रकाशित कर दिया जाए । इस ग्रन्थ में पुराणों के बहुत से विषयों को चुना गया है, लेकिन विषयों के शीर्षकों का चुनाव बृहत् कार्य है और उसे भविष्य में और अधिक बृहत् रूप में दिया जा सकता है ।  

   लेखक - त्रय ने अपना संकलन केवल पुराणों तक ही सीमित नहीं रखा है । पुराणों के अतिरिक्त उन्होंने वाल्मीकि रामायण, योगवासिष्ठ, महाभारत, कथासरित्सागर, लक्ष्मीनारायण संहिता जैसे ग्रन्थों से भी सामग्री का चयन किया है । लक्ष्मीनारायण संहिता ग्रन्थ भाषा की दृष्टि से अपेक्षाकृत अर्वाचीन काल का प्रतीत होता है लेकिन लेखकों ने अपने संकलन में उसे स्थान देना उचित समझा है । भविष्य के इतिहासकारों के लिए यह एक चेतावनी का विषय है । आज से हजार - दो हजार वर्ष पश्चात् के इतिहासकार कह सकते हैं कि लक्ष्मीनारायण संहिता भी एक पुराण है क्योंकि इस समय के अनुक्रमणिका बनाने वाले लेखक - त्रय ने इसे अपनी अनुक्रमणिका में स्थान दिया है । लेकिन यह ध्यान रखना होगा कि किसी ग्रन्थ के पुराण कहलाने के लिए पांच या दस लक्षण निर्धारित कर  दिए गए हैं । जिन ग्रन्थों में यह सारे लक्षण मिलेंगे, केवल उन्हें ही पुराण कहा जा सकता है । अतः लेखक - त्रय अपने संकलन में चाहे जिस ग्रन्थ को स्थान दें, उन्हें पुराणों की संज्ञा नहीं दी जा सकती ।

          मैं कामना करता हूं कि लेखक - त्रय इस अनुक्रमणिका का शेष भाग भी शीघ्र पूरा करने में समर्थ हों । यह कार्य बहुत ही श्रमसाध्य तथा शोधपरक है । इन ग्रन्थों के आने से भारतीय विद्या के विद्वानों तथा शोध छात्रों को लाभ होगा, ऐसा मेरा विश्वास है । भगवान् उन्हें सामर्थ्य और सुविधा प्रदान करे, इसी अभिलाषा के साथ मैं उन्हें बधाई भी देता हूं तथा उत्साहवर्धन भी करता हूं । संयोगवश, लेखक - त्रय का सम्बन्ध भी मेरे पैतृक जन्मस्थान से ही है ।

पुष्पेन्द्र कुमार

२४-१०-२००४ ई.



प्राक्कथन

श्रीमती राधा गुप्ता तथा श्री विपिन कुमार के माध्यम से पुराण विषय अनुक्रमणिका के सृजन का जो कार्य चल रहा है , उसे देखकर मुझे अत्यन्त आत्मिक सन्तोष का अनुभव होता है । विगत वर्षों में हमारे देश में वेदों के पुनरुद्धार का प्रयत्न तो बहुत किया गया है , लेकिन उसमें सफलता अधिक नहीं मिल सकी है । दूसरी ओर , पुराण धार्मिक ग्रन्थों की कोटि में होने पर भी उनको ऐतिहासिक राजाओं आदि का वर्णन समझकर उनकी उपेक्षा सी कर दी गई है । यह हर्ष का विषय है कि श्रीमती राधा गुप्ता तथा उनके सहयोगी लेखकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि पुराण और वेद अन्योन्याश्रित हैं और पुराण कोई ऐतिहासिक राजाओं का वर्णन न होकर वेदों के छिपे रहस्यों को प्रकट करने का एक माध्यम हैं जिनको समझने के लिए तर्क और श्रद्धा दोनों की आवश्यकता पडती है । पुराणों का महत्त्व इसलिए और अधिक हो जाता है क्योंकि हमारे सारे समाज का आधार पुराणगत वर्णन हैं । पुराणों में किसी तथ्य का वर्णन जिस रूप में भी उपलब्ध है , चाहे वह वर्तमान दृष्टि से उचित है या अनुचित , हमारे कट्टरपन्थी समाज में उसका अक्षरशः पालन हो रहा है । लेकिन यह ध्यान देने योग्य है कि पुराणों की भाषा को अक्षरशः उसी रूप में मानना जिसमें वह कही गई है , मूढता होगा । पुराणों में सूक्ष्म और कारण शरीर की घटनाओं को स्थoल शरीर के स्तर पर समझने योग्य बनाया गया है । यदि पुराणों में शूद्र की छाया पडने का निषेध है तो इस कथन को आंख - कान बंद करके मानना तो मूर्खों का काम होगा । महाभारत आदि ग्रन्थों में यह स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि ब्राह्मण कौन है , कौन क्षत्रिय है , कौन वैश्य है और कौन शूद्र । जिसने अपने काम , क्रोध आदि पर विजय पा ली हो वह ब्राह्मण हो सकता है , इस प्रकार पुराणों की दृष्टि से सोचा जाए तो हम सभी शूद्र अथवा शूद्रेतर ही हैं , ब्राह्मणत्व का तो कहीं नाम ही नहीं है ।

प्रायः कहा जाता है कि वेद पढने का अधिकार केवल ब्राह्मण को है और शूद्र तो केवल पुराण ही सुन सकता है । इस कथन में तनिक भी संदेह का स्थान नहीं है । जब तक व्यक्ति बिल्कुल सात्विक न हो जाए , मोक्ष की अवस्था के एकदम निकट न पहुंच जाए, तब तक वेदों को समझना बहुत कठिन कार्य है । दूसरी ओर , पुराणकारों ने राजाओं की कथाओं के माध्यम से वेद के जिन रहस्यों के उद्घाटन का प्रयास किया है , उन रहस्यों को क्षुद्र बुद्धि का व्यक्ति , जिसे शूद्र कहा जाता है , श्रद्धापूर्वक सुनकर रहस्यों को समझ सकता है ।

यह तो रही पुराणों की बात । लेकिन वर्तमान में प्रस्तुत पुराण विषय अनुक्रमणिका पढने का अधिकार किसको है ? मेरा विचार है कि वैसे तो पुराणों में रुचि रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति इसे पढकर पूरे वैदिक समुद्र में स्नान का आनन्द ले सकता है , लेकिन जो व्यक्ति ध्यान साधना की प्रक्रिया से गुजर चुका है , वह पुराण विषय अनुक्रमणिका के माध्यम से वैदिक समुद्र में गोते लगाकर अपनी साधना को वेदोन्मुखी, पुराणोन्मुखी बना सकता है जिसकी विगत हजारों वर्षों से आवश्यकता रही है ।

 

                                       डाँ. हरिहर त्रिवेदी

 साहित्य वाचस्पति , काव्यतीर्थ ,एफ.आर.ए.एस. ( लन्दन ),

 निदेशक ( सेवा निवृत्त ) पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग ,

 म.प्र.शासन ।


प्रस्तावना

पुराण विषय अनुक्रमणिका नामक ग्रन्थ शृंखला की यह द्वितीय कडी है । श्री विपिन कुमार और उनकी सुयोग्य अनुजा श्रीमती राधा गुप्ता एम.ए.,पीएच.डी., डी.लिट्. का यह अत्यन्त सराहनीय सम्मिलित प्रयास है । पुराणों में प्रयुक्त वैदिक पारिभाषिक शब्दों के सन्दर्भ प्रस्तुत करते हुए लेखक द्वय ने अपने व्यापक अध्ययन के आधार पर इसमें पुराणगत वैदिक सन्दर्भ खोजने एवं स्थान स्थान पर उनकी व्याख्या प्रस्तुत करने का प्रयास भी किया है । । इससे न केवल इसको एक सन्दर्भ ग्रन्थ कहा जा सकता है , अपितु इसमें संदर्भ संग्रह के साथ साथ जो यत्र तत्र व्याख्या मिलती है उसके आधार पर इसे वेद एवं पुराण का तुलनात्मक अध्ययन भी कह सकते हैं । इस दृष्टि से , इस ग्रन्थ शृंखला को पुराण एवं वेद का आधारभूत सम्बन्ध बतलाने वाला भी कह सकते हैं । सामान्यतः विद्वान् पुराण परम्परा को ऐतिहासिक दृष्टि से परवर्ती काल का मानते हैं , परन्तु वैदिक संहिताओं और ब्राह्मण ग्रन्थों में पुराण , पुराणविद् और पुराणवेद जैसे शब्द इस मान्यता पर पुनर्विचार करने को बाध्य करते हैं ।

    अतः पुराणों में प्रयुक्त वैदिक सन्दर्भों का यह संग्रह ग्रन्थ वेद और पुराण के शोधकर्ताओं के लिए अतिशय उपादेय हो जाता है । ऐसा प्रतीत होता है कि वेद और पुराण एक ही वेद विज्ञान को दो भिन्न प्रकार से प्रस्तुत करते हैं । इस ग्रन्थमाला में वेद और पुराण की तुलनात्मक दृष्टि को अपनाकर हमारी सनातन भारतीय संस्कृति के उन रहस्यों के उद्घाटन का प्रयास किया गया है जो परम्पराजनित अनेक पूर्वाग्रहों के कारण अभी तक दुर्बोध बने हुए हैं । आशा है कि श्री विपिन कुमार की वैज्ञानिक दृष्टि और श्रीमती राधा गुप्ता का सांस्कृतिक वैदुष्य इस दिशा में उत्तरोत्तर प्रगति करता हुआ शोधार्थियों और सुविज्ञ प्राध्यापकों के लिए एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सामग्री प्रस्तुत करेगा । इस स्तुत्य कार्य के लिए दोनों ही साधुवाद के पात्र हैं ।  -फतहसिंह




प्राक्कथन

यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते । तया मामद्य मेधाविनं कुरु ।।

परमात्मा से मेधा बुद्धि की प्रार्थना की गई । मत्वा कर्माणि सीव्यति , जो मनुष्य मनन करके कार्यों को करने में तत्पर होता है , वही मानव है । सृष्टि की उत्पत्ति के साथ ही साथ परमात्मा ने जीवमात्र के हित के लिए अपना ज्ञान दिया । इस ज्ञान के द्वारा मानव ने अपने को सुखी बनाने के साधनों का निर्माण किया । अतः जहाँ पशु योनि केवल भोग भोगने में ही तत्पर है , वहाँ मनुष्य भोग और कर्म प्रधान है । वेदों से आचार - विचार , ज्ञान - विज्ञान , विश्वबन्धुत्व तथा प्राणिमात्र आदि के कल्याणकारक सिद्धान्तों का आविष्कार हुआ है । इन आदर्शों की छाप किसी समय सारे विश्व में थी और भारत जगद्गुरु बन गया था । भारतवर्ष को पहचानना है तो संस्कृत साहित्य को अपनाना आवश्यक है ।

कतिपय विशेष विभूतियां सामने आती हैं और इस भौतिकवाद की चकाचौन्ध से प्रभावित न होकर मानव संस्कृति और सभ्यता की रक्षा करने में तत्पर रहती हैं । आज मेरे सम्मुख लेखकद्वय का प्रयास वर्तमान पुस्तक के रूप में है । लेखकों की जिज्ञासा को समझा कि उनका प्रयास है कि वैदिक शब्दों की व्याख्या के लिए पहले पुराणों में बिखरे हुए वैदिक शब्दों को , जो कथा रूप में प्रकट किए गए हैं , उनको समझना ठीक है । देखा जाए तो वेदों में कोई लौकिक कथा और इतिहास नहीं है , उनमें सार्वभौमिक सिद्धान्त हैं । लेखकद्वय ने बृहत् कार्यभार ग्रहण किया । विचित्र बात यह है कि एक ही माता - पिता के इन दोनों भाई - बहिनों पर आस्तिक और संस्कारित परिवार का प्रभाव पडा । यह प्रभाव इतना पडा कि पुत्री को संस्कृत की विदुषी बनते देख इनके पिता श्री बलवीर सिंह जी कुशल व्यापारी होते हुए भी आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर हो गए , पुत्र भी वैराग्य की ओर अग्रसर हो बिना संस्कृत पढे ही स्वाध्यायरत हो वेदों की ओर प्रवृत्त हो गया । देवबन्द का सौभाग्य है - जिस भूमि में इन दोनों ने जन्म लिया । सौ.राधा गुप्ता प्रारम्भ से ही मेधावी छात्र रही । एम.ए. संस्कृत पढते समय ही वेद, निरुक्त , दर्शन आदि को जैसे ही पढा , दूसरे दिन बडी सरलता के साथ सुना कर ही अगला पाठ पढना नित्य नियम था । यह प्रखर बुद्धि निन्तर वृद्धि करती करती कठिन गृहस्थ भार को सुगृहिणी बन कर अपने परिवार को भी योग्य बना संस्कृत का स्वाध्याय कर पीएच.डी. और डी.लिट्. की उपाधियों से अलंकृत हुई । एक आदर्श विदुषी का अनुकरणीय साहस तप से कम नहीं है । चि.विपिन का स्वभाव भी छात्र अवस्था से तार्किक था । अपनी अवस्था के अनुसार प्रश्नों को पूछना - जब तक सन्तुष्ट न हो जाता था , तब तक चैन नहीं मिलता था । एक सम्पन्न घराने का एम.एस.सी. युवक अन्य युवकों की भांति भौतिकवादी बन सकता था , परन्तु आध्यात्मिक प्रभाव ऐसा पडा कि वैदिक ज्ञान की ओर प्रवृत्ति हो गई । साथ ही दिल्ली में डा. फतहसिंह जी के सान्निध्य से वैदिक छात्र ही बन गया और वैदिक तत्व मंजूषा ( पुराणों में वैदिक संदर्भ ) प्रस्तुत कर दी । गुरु भाव रूप में दोनों ने अपनी कृतियां मुझे भेंट की ।

लेखकद्वय ने यह पुराण विषय अनुक्रमणिका लिखने में अथक प्रयास किया । प्रायः २२ पुराणों , संहिता , श्रौत और गृह्य सूत्रों , ब्राह्मण ग्रन्थों, उपनिषदों, ऋग्वेद, अथर्ववेद, निरुक्त आदि का स्वाध्याय कर विशेष टिप्पणियों द्वारा शब्दों को सरलता से समझाने का प्रयास सराहनीय है जो अनुसंधान करने वालों के लिए पथप्रदर्शक बनेगा । मैं अपने इन लेखकद्वय के भविष्य की उज्ज्वल कामना करता हुआ इनके दीर्घजीवन और यशस्वी बनने की प्रार्थना करता हूं ।

शमिति ।

ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी , वि. सम्वत्~ २०५५

 विश्वम्भरदेव शास्त्री

 सेवामुक्त प्रवक्ता

 स्वतन्त्रता सेनानी

 शिक्षक नगर

 देववृन्द