पुराण विषय अनुक्रमणिका


(From Riksha to Ekaparnaa)

Radha Gupta, Suman Agarwal and Vipin Kumar

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Riksha - Rina ( Uushmaa/heat, Riksha/constellation, Rigveda, Richeeka, Rijeesha/left-over, Rina/debt etc.)

Rinamochana - Ritu ( Rita/apparent - truth, Ritadhwaja, Ritambhara, Ritawaaka, Ritu/season etc. )

Ritukulyaa - Rishi  (  Rituparna, Ritvija/preist, Ribhu, Rishabha, Rishi etc.)

Rishika - Ekaparnaa (  Rishyamuuka, Ekadanta, Ekalavya etc.)





Different types of interpretations are available for the meaning of word rishi/seer in vedic and puraanic literature. The word has acquired importance because every hymn of Vedas has got a particular rishi associated with it. At some places in braahmanic literature, rishis have been stated to be praanas/life forces. At other places, it has been stated that those who made efforts and made penances, that gave them the name rishis. On the other hand, the puraanic literature uniquely classifies rishis into 3 categories – those who acquired rishihood by truth, those who acquired by knowledge and those who acquired by penances. At other places, in puraanic texts, it has been stated that rishis composed the mantras for five reasons – for dissatisfaction, for fear, for sorrow, for happiness and for grief/deep sorrow. In Mahaabhaarata, at one place, rishis have been classified as those having tendency of  indulgence in activity and those having tendency of abstinence from activity. Vasishtha, Bhardwaaja etc. fall into the first category, while, Sanah, Sanandana, Kapila etc. fall into the second category. But these statements do not satisfy us today because the meanings of words like truth, penances, knowledge etc. are not known today. There is a story in puraanas that a demon stole the vedic mantras and took these into ocean. The mantras got mixed with ocean. Then lord Vishnu ordained the rishis to collect the mantras from the water of the ocean. Then whosoever rishi collected whichever mantra or hymn, that became famous with his name. In this story, it is inherent that rishis collected the essence of water, the juice as has been called in the story. If one tries to translate the classical word juice in modern language, then it can be translated as lowering of entropy of a system. The meaning of lowering of entropy can be understood in the way that, according to the law of thermodynamics, the entropy of the universe is increasing with time. The energy is indestructible. It will remain the same. But it is going in a direction where it will be impossible to take any useful work from it. For example, when the steam is confined in the cylinder of a steam engine, any useful work can be taken from it. When it is release in air, it becomes useless for work. The fact of lowering of entropy by rishis is corroborated by one other anecdote in braahmanic literature. One type of rishis, called Angiras, could not see the sacrifice, the yagnas, but could only see a tortoise with its serpentine motion. These rishis invoked the tortoise to stop, but it did not. They invoked it in the name of Indra, Brihaspati, Ashvinau etc. but it did not stop. It stopped only with the name of Agni, the fire. Here the tortoise has been stated to be symbolic of juice. And it’s stoppage can be interpreted as the lowering of entropy by stoppage of motion, the disorder.

Relation of rishis with praanas : When it is stated in braahmanic literature that praanas are the rishis, then here it may be understood that only those pranas which have come into rhythm with mind and speech can be called the rishis ( These are  the rishis with truth according to one vedic mantra). In outer world, the trio of sun, earth and moon forms an year. In spirituality, the trio of praana, speech and mind form an year. Those praanas which have not formed a triangle, can be called the manes, the pitris.

Gradual approach to rishihood : Skanda puraana provides 8 gradations of a braahmin, the first of which is Maatra and the last is Muni. The one but last is rishi. Moreover, in puraanic and vedic literature, a rishi has been called as higher than a Vipra. Who is a vipra, has been clarified in vedic mantras which desire for increase of wisdom of a vipra. After that may come the state which can be called a rishi.

Caste and rishi : There are universal references of warrior rishis – those who acquired rishihood from their career as a warrior. But it seems that it is very difficult for a warrior rishi to become a Brahma rishi, as in the story of Vishvaamitra and Vasishtha. There are also few personalities who got rishihood  starting from a mean caste. And vedic literature universally refers to old and new rishis. What does it actually mean, is yet to be investigated.

Characteristics of rishis : Different rishis have been attributed special characteristics. For example, Vasishtha can see Indra, a feat which other rishis can not do. Bharadwaaja can make the trees produce fruits without season( the fruits may be symbolic of extrasensory perceptions, the super consciousness ) . The  meaning of Bhardwaaja at grosser level is one who can provide food. Gotama has got the power of letting sunrays reach the lowest levels which is otherwise not possible. He has been stated to be able to dig a well which can provide water in famine. In yoga language, digging a well means to reach one's moolaadhaara, the base level.Our feet are the lowest part of moolaadhaara. Lord Raama elevates Ahalyaa , the wife of Gotama, with the toe of his foot.



           ऋषि शब्द के बहुत से निर्वचन ब्राह्मणों, पुराणों, निरुक्त, धातु कोश आदि में मिल सकते हैं । उदाहरण के लिए, शतपथ ब्राह्मण ६.१.१.१ का कथन है कि प्राण ऋषि हो सकते हैं । श्रम व तप से क्रोध किया( श्रमेण तपसा अरिषन् ), इसलिए ऋषि नाम पडा । लेकिन व्यवहार में यह कथन ऋषि शब्द को समझने के लिए पर्याप्त नहीं है । शब्दों का अर्थ लगाने के लिए धातु कोश का आश्रय लिया जाता है । ऋषि धातु गत्यर्थक है जिसे अप्रत्यक्ष रूप से ज्ञानार्थक समझा जाता है ( गम् - ज्ञाने ) । वायु पुराण अध्याय ५९ में तो ऋषि धातु को गति, तप, सत्य आदि सभी अर्थों में लिया गया है ।  पुराणों में ऋष् हिंसायाम द्वारा भी ऋषि को समझाने की चेष्टा की गई है । एक कथा में ऋषि यज्ञ में पशु  हिंसा का समर्थन नहीं करते, जबकि उपरिचर वसु करता है । अतः ऋषि उसे शाप दे देते हैं । पुराणों में ऋषियों का वर्गीकरण ३ श्रेणियों में किया गया है - सत्य से ऋषिता प्राप्त करने वाले, ज्ञान से ऋषिता प्राप्त करने वाले और तप से ऋषिता प्राप्त करने वाले । पुराणों में इनमें से प्रत्येक वर्ग के ऋषियों के नाम भी दिए गए हैं । पुराणों के इस वर्गीकरण की पुष्टि अथर्ववेद २.६.१( सत्य ऋषि ), २.३५.४( घोर ऋषि ), ११.१.२६( तप से उत्पन्न ऋषि ) द्वारा होती है । ब्रह्माण्ड पुराण १.२.३२.६८ आदि में कहा गया है कि तपोरत ऋषियों ने मन्त्रों की रचना ५ कारणों से की - असंतोष, भय, दुःख, सुख व शोक से । लेकिन ब्राह्मणों व पुराणों के उपरोक्त कथन हमें संतुष्ट नहीं करते । इसका एक कारण यह भी है कि आज सामान्य रूप से सत्य, ज्ञान, तप शब्दों का अर्थ भी पता नहीं है । वर्तमान प्रपत्र में ऋषि शब्द को ऋषियों के संदर्भ में आए अन्य कथनों के आधार पर समझने का प्रयास किया गया है । शतपथ ब्राह्मण १.६.२.३, तैत्तिरीय संहिता २.६.३.२ आदि में वर्णन आता है कि ऋषियों ने देखा कि देवताओं ने स्वर्ग जाने के पश्चात् यज्ञ में यूप को उल्टा करके गाड दिया जिससे अन्य लोग स्वर्ग न जाने पाएं । तब उन्होंने वहां यज्ञवास्तु रूप कूर्म को  देखा जो सर्पण कर रहा था । उन्होंने कूर्म से कहा कि ठहर जा । वह न हिरा । वह सर्पण ही करता रहा । ऋषियों ने उससे कहा - इन्द्र के लिए ठहर, बृहस्पति के लिए ठहर, अश्विनौ देवताओं के लिए ठहर, अग्नि के लिए ठहर आदि । अग्नि के नाम से वह ठहर गया । कूर्म में ऋषि शब्द का रहस्य छिपा  है । एक अन्य संदर्भ में कहा गया है कि यह जो कूर्म है, यह आङ्गिरस ऋषि प्राणों द्वारा एकत्र किया गया अङ्ग - अङ्ग का रस है । यज्ञ में कूर्म पुरोडाश का रूप भी होता है और पुरोडाश मस्तिष्क का । जैसे मस्तिष्क अङ्ग - अङ्ग के रस से बना है, सब अङ्गों का सार रूप है, वैसे ही कूर्म भी है । और इस रस को एकत्र करने का, रस निकालने का कार्य प्राण रूपी ऋषि करते हैं । जहां भ{ कहीं रस निकालने का, सार भाग ग्रहण करने का काम हो, वहां कोई न कोई प्राण रूप ऋषि प्रकट हो जाता है । पुराणों में आता है कि प्राचीन काल में किसी कारण से वेद समुद्र के जल में मिल गए । विष्णु ने ऋषियों को आदेश दिया कि इन्हें एकत्र करो । तब जिस - जिस ऋषि ने जो - जो मन्त्र जल से प्राप्त किए, उनकी ख्याति उन्हीं के नाम से हो गई । इस कथा में भी अप्रत्यक्ष रूप से जल से सार को, रस को ग्रहण करने की बात कही गई है । रस को ग्रहण करने में क्या कठिनाई है ? हमारी जिह्वा सारे रसों का आस्वादन करती ही है । सारे प्राण रूपी ऋषि इस पर विराजमान हैं । लेकिन हमारी जिह्वा घास के रस का आस्वादन नहीं कर पाती जिसका आस्वादन अन्य पशुओं की जिह्वा कर लेती है । आधुनिक विज्ञान का कहना है कि यह प्रत्येक प्राणी की जिह्वा में उपलब्ध एन्जाईम के कारण है । एन्जाइम को इस प्रकार समझा जा सकता है कि सामान्य परिस्थिति में कोई भी प्राणी किसी रस का आस्वादन नहीं कर सकता । इसका कारण यह है कि थोथे पदार्थ के अणुओं को तोडकर उनसे रस का आस्वादन करने में बहुत शक्ति की आवश्यकता होती है जो पशुओं की जिह्वा के रस में नहीं है । लेकिन प्रकृति ने जिह्वा के रस में एक रासायनिक पदार्थ मिलाया है जो इस भारी भरकम कार्य को सरल बना देता है । इस रासायनिक पदार्थ को एन्जाइम कहते हैं । उदाहरण के लिए यदि कोई दीवार ८ फुट ऊंची खडी है जिसे कूद कर पार करना कठिन है तो एन्जाइम उसे २ - ३ फुट ऊंची ही कर देता है । यह एन्जाइम प्रत्येक पशु में अलग - अलग होता है । सामान्य रूप से तृण या फाइबर का रस लेने की शक्ति दीमक के सिवाय और किसी प्राणी में नहीं है । केवल दीमक में ही वह एन्जाइम होता है जो लकडी या किसी अन्य तन्तु के अणु को तोडकर उसका रसास्वादन कर सकता है । और वैदिक साहित्य ने इस उदाहरण का भरपूर प्रयोग किया है । यज्ञ में दीमक की बांबी की मिट्टी को लाकर प्रयोग किया जाता है और कहा गया है कि यह जो दीमक द्वारा पृथिवी की मिट्टी को बाहर फेंकने से छिद्र बने हैं, यह हमारे कान या श्रोत्र हैं । ऋग्वेद में एक ऋषि का नाम वमि| वैखानस है । वमि| दीमक को कहते हैं । कहने का तात्पर्य यह है कि रस विशेष का आस्वादन करने के लिए, ब्रह्माण्ड की प्रत्येक वस्तु का रसास्वादन करने के लिए हमें अपने प्राणों को, ऋषियों को जाग्रत करना पडेगा, उन्हें सबल बनाना होगा । यह कार्य पुराणों में तीन प्रकार से संभव बताया गया है ।

          ऋषि शब्द की एक निरुक्ति का प्रयास ऋक्ष के आधार पर भी किया जा सकता है । ऋक्ष या नक्षत्र भी रस का आदान करते हैं ।

          ऋषियों द्वारा रस के सम्भरण का संदर्भ वैदिक साहित्य में केवल आङ्गिरस ऋषियों द्वारा कूर्म के रूप में रस के सम्भरण तक ही सीमित नहीं है । ऋग्वेद ९.६७.३२ , तैत्तिरीय ब्राह्मण १.४.८.४ आदि में पावमानी ऋचाओं को ऋषियों द्वारा सम्भृत रस कहा गया है ।

          ऋषियों द्वारा रस के सम्भरण को एक अन्य दृष्टिकोण से भी समझा जा सकता है । आधुनिक भौतिक विज्ञान में तापगतिकी के दूसरे सिद्धान्त के अनुसार इस संसार में प्रत्येक तन्त्र की अव्यवस्था की माप में वृद्धि हो रही है । इसका अर्थ यह है कि इस संसार में जितनी ऊर्जा हमारे पास है, उसे उपयोगी कार्य में परिणत करना धीरे - धीरे कठिन होता जा रहा है । इसको इस प्रकार समझ सकते हैं कि एक वाष्प इंजन में जब तक वाष्प उसके सिलिण्डर में बंद है, उससे कोई भी कार्य लिया जा सकता है क्योंकि सीमित स्थान में बद्ध होने के कारण उसकी एण्ट्रांपी कम है । यदि उस वाष्प को वायुमण्डल में मुक्त कर दिया जाए तो वह फैल जाएगी, उसकी एण्ट्रांपी, अव्यवस्था में वृद्धि हो जाएगी  । तब उससे कोई कार्य नहीं लिया जा सकता । रस के सम्भरण से तात्पर्य एक तन्त्र को उच्च अव्यवस्था की स्थिति या उच्च एण्ट्रांपी की स्थिति से निम्न अव्यवस्था की स्थिति या निम्न एण्ट्रांपी की स्थिति तक लाना भी हो सकता है । रस के सम्भरण का कार्य करने के लिए लगता है कि ऋषि रूपी इंजन के चालक को ७ छन्द रूपी ७ कुंजियां दी गई हैं । लेकिन प्रश्न यह उठता है कि क्या जड वस्तुओं के संदर्भ में बने आधुनिक भौतिक विज्ञान के नियमों को उच्चतर चेतना से सम्बन्ध रखने वाले वैदिक साहित्य की घटनाओं पर लागू किया जा सकता है ? इस प्रपत्र की विषय वस्तु इस प्रश्न का एक सीमा तक उत्तर खोजने में सहायक होगी । ऊपर ऋषियों द्वारा द्रष्ट कूर्म के संदर्भ में भी कूर्म में जब तक सर्पण विद्यमान है, वह उच्चतर अव्यवस्था का प्रतीक है । जब सर्पण या चञ्चलता समाप्त हो जाएगी तो वह निम्न अव्यवस्था या निम्न एण्ट्रांपी की स्थिति होगी । वैदिक साहित्य के अनुसार अहोरात्र सर्पण करते हैं ।

प्राणों व ऋषियों में सम्बन्ध : वैदिक साहित्य में ऋषियों को सार्वत्रिक रूप से प्राण कहा गया है (उदाहरण के लिए, ऐतरेय ब्राह्मण २.२७, शतपथ ब्राह्मण ७.२.३.५, ९.१.२.२१) । शतपथ ब्राह्मण ८.४.१.५ का कथन है कि प्राण ही स्तोम हैं । और कि संभवतः प्राण ही ऋषि हैं । जैसा कि छन्दों के संदर्भ में आगे कहा जाएगा, ऐसा अनुमान है कि भौतिक पृथिवी तो सूर्य की परिक्रमा करती है, लेकिन चेतन पृथिवी चेतन सूर्य की परिक्रमा नहीं करती । वैदिक साहित्य में यह अपेक्षित है कि ऐसा हो, संवत्सर का निर्माण हो । वैदिक साहित्य में मन, प्राण और वाक् को क्रमशः चन्द्रमा, सूर्य व पृथिवी माना गया है । यदि मन, प्राण और वाक् में परस्पर कोई सम्पर्क हो जाए तो वह श्रेष्ठ स्थिति होगी । जैमिनीय ब्राह्मण २.४०९ तथा ३.३३४ में उल्लेख आता है कि सब देव प्रजापति से दूर चले गए लेकिन इन्द्र नहीं गया । तब प्रजापति ने इन्द्र से कहा कि स्तो मे, मेरी स्तुति करो । ऐसा करने से प्रजापति की प्रजा पुनः प्रजापति के पास आ गई और उनके साथ में सर्वश्रेष्ठ अन्न या अन्नाद्य भी प्रजापति के पास आ गए । यह स्तो - मे ही स्तोम कहलाया । इसका निहितार्थ यही हो सकता है कि किसी प्रकार चेतन स्तर पर मन, प्राण और वाक् का परस्पर सम्बन्ध जुड जाए, वह एक  दूसरे की परिक्रमा करने लगें तो स्तोम उत्पन्न हो सकता है । स्तुति से तात्पर्य परिक्रमा होना चाहिए । अतः शतपथ के उपरोक्त कथन से निष्कर्ष यह निकलता है कि केवल वही प्राण प्राण कहलाने योग्य  हैं जो संवत्सर से एकाकार हो गए हों । और वही ऋषि हैं । जो प्राण संवत्सर से एकाकार नहीं हुए हैं, वे कौन हैं ? ऋग्वेद ४.४२.८ से लगता है कि उनकी पितर संज्ञा है ।

ऋषि व विप्र में सम्बन्ध :    ऋग्वेद ३.५३.१०, ४.२६.१, ४.५०.१, ५.५४.१४ ७.२२.९, ८.३.१४, ८.७९.१, ९.८७.३, ९.९२.२, ९.९६.६, ९.१०७.७, १०.१०८.११ आदि में ऋषि व विप्र शब्द साथ - साथ आए हैं । यह संकेत करता है कि ऋषि और विप्र में कुछ गहरा  सम्बन्ध है । जैसे पुराणों में ऋषि को विप्रों में श्रेष्ठ कहा गया है, ऐसे ही ऋग्वेद ९.९६.६, तैत्तिरीय आरण्यक १०.१०, १०.५० आदि में भी । इसका तात्पर्य यह हो सकता है कि ऋषि की ऊंचाई पर पंहुचने से पहले की प्रारम्भिक अवस्था विप्र शब्द में निहित है । विप्र शब्द ऋग्वेद के बहुप्रयुक्त शब्दों में से एक है । विप्र शब्द को पुराणों में ब्राह्मण शब्द द्वारा समझने का प्रयास किया जा सकता है । स्कन्द पुराण १.२.५.१०९ में ब्राह्मण के ८ भेद गिनाएं गए हैं और उन्हें परिभाषित किया गया है । यह हैं - मात्र, ब्राह्मण, श्रोत्रिय, अनूचान, भ्रूण, ऋषिकल्प, ऋषि व मुनि । इनमें से उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं । श्रोत्रिय वह होता है जिसने वेद की एक शाखा का अध्ययन उसके उपाङ्गों सहित कर लिया हो । ऐसे ही अनूचान वह होता है जिसने सम्पूर्ण वेद - वेदाङ्गों का अध्ययन कर लिया हो । ऋषि वह होता है जो ऊर्ध्वरेता हो, अग्र्य हो, नियताशी हो, संशयरहित हो, शाप व अनुग्रह में समर्थ हो व सत्यसन्ध हो । ऋषि से उच्चतर स्थिति मुनि की कही गई है जो द्वन्द्वों से परे होता है । शतपथ ब्राह्मण ३.५.३.१२ में विप्र की परिभाषा करते हुए कहा गया है कि जो ब्राह्मण शुश्रुवान् हैं, अनूचान हैं, वे विप्र हैं । यह कथन स्कन्द पुराण के कथन की पुष्टि करता है । इसके अतिरिक्त, चूंकि विप्र शब्द ऋग्वेद का एक बहुप्रयुक्त शब्द है, अतः ऋग्वेद की ऋचाओं से विप्र के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होनी चाहिए । ऋग्वेद की ऋचाओं में सार्वत्रिक रूप से विप्र की मति के वर्धन की कामना की गई है ( उदाहरण के लिए, ऋग्वेद ७.९३.४, १०.२५.१०, १०.६४.१६, १०.१४८.३, तैत्तिरीय ब्राह्मण २.५.४.१ आदि ) । मति का वर्धन विप्र गिरा से, विज्ञानमय कोश की वाक् से करते हैं । छान्दोग्य उपनिषद ७.१८.१ के अनुसार यदि सत्य बोलना हो तो विज्ञान का साक्षात्कार आवश्यक है, मति से विज्ञान आता है, श्रद्धा से मति आती है, जब श्रद्धा उत्पन्न होती है, तभी व्यक्ति मनन करता है, तभी मति उत्पन्न होती है, निष्ठा से श्रद्धा उत्पन्न होती है, कृति से निष्ठा उत्पन्न होती है, सुख से कृति और भूमा से सुख । अतः भूमानन्द की अनुभूति करना ही अभीष्ट है । तैत्तिरीय संहिता ५.७.५.७ के अनुसार भूमा द्वारा ऋषियों ने आदित्य व परमेष्ठी को प्राप्त किया । शाण्डिल्योपनिषद १.२१ का कथन है कि वेदविहित कर्म मार्गों में श्रद्धा होने का नाम ही मति है । इसका अर्थ यह हुआ कि जो भी कार्य किया जाए, उसे पूरी समझ के साथ, उसके पीछे जो विज्ञान छिपा है उसके साथ, किया जाए, यही मति है । वैदिक साहित्य की एक सार्वत्रिक ऋचा है - युञ्जते मन उत युञ्जते धियः विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः ( ऋग्वेद ५.८१.१) । इसकी व्याख्या में शतपथ ब्राह्मण ६.३.१.१६ में कहा गया है कि मन और प्राण को ही कर्म में युक्त करते हैं । यह विप्रों के लिए, विप्र शब्द के बहुवचन के लिए स्थिति है । इससे एकवचन का विप्र उत्पन्न होता है जिसे प्रजापति कहा गया है तथा शतपथ ब्राह्मण ३.५.३.१२ में यज्ञ कहा गया है । अनुमान कर सकते हैं कि इससे आगे फिर ऋक् की स्थिति हो सकती है जिसके बारे में ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है कि यत् कर्म क्रियमाणमृगभिवदति - कर्म करने  से पूर्व ही आभास हो जाता है । वह ऋषि की स्थिति हो सकती है । श्रद्धा से मति उत्पन्न होने के संदर्भ में, ब्राह्मण ग्रन्थों का कथन है कि अश्रद्धा से शूद्र होता है और जब शूद्र में श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है तो वह ब्राह्मण बन जाता है । ऐतरेय ब्राह्मण २.४० में स यन्ता विप्र एषाम् इति की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि अपान ही यन्ता है, अपान द्वारा ही प्राण यत है, दूर नहीं जाता है । ऐतरेय ब्राह्मण २.४१ के अनुसार वायु ही यन्ता है, वायु के कारण ही अन्तरिक्ष यत है । इससे तात्पर्य निकलता है कि जहां प्राणों को ऋषियों की संज्ञा दी गई है, वहीं अपान को विप्र की संज्ञा दी गई है ।

राजर्षि व विप्रर्षि :     पुराणों में राजर्षि और ब्रह्मर्षि के उल्लेख आते हैं । पुराणों की कथा में राजर्षि विश्वामित्र की कथा प्रसिद्ध है जिन्हें ब्रह्मर्षि वसिष्ठ ने ब्रह्मर्षि की उपाधि बहुत समय तक नहीं दी थी । यह भेद लगता है वैदिक साहित्य में नहीं है । लेकिन परोक्ष रूप से ऋषि के साथ विप्र शब्द जोडकर लगता है यह संकेत किया गया है । ऋग्वेद ४.२६.१ में कक्षीवान् स्वयं को विप्र कहता है । इसका कारण यह है कि पुराणों की कथाओं में कक्षीवान् पहले शूद्र था जिसने तप से ऋषित्व व ब्राह्मणत्व प्राप्त किया । ऐसे ही ऋग्वेद ३.३३.४ व १२ में विश्वामित्र स्वयं को विप्र कहता है ।

          यह उल्लेखनीय है कि ऋग्वेद ६.११.३ में विप्र को अङ्गिरसों में वेपिष्ठ कहा गया है । ऋग्वेद ६.३५.५ में विप्र ब्रह्म द्वारा अङ्गिरसों का उद्धार करता है ।

पूर्व व नूतन ऋषि : वैदिक साहित्य में सार्वत्रिक रूप से पूर्व व नूतन ऋषियों का उल्लेख आता है (उदाहरण के लिए, ऋग्वेद १.१.२, १.४८.१४, ४.२०.५, ७.२२.९, ७.२९.४,अथर्ववेद ११.३.३२, १८.२.२, १८.२.१५, १८.३.४८, तैत्तिरीय संहिता ४.४.२.३( प्रथमजा ), ४.७.१३.१, ५.७.७.१ आदि । यह पूर्व और नूतन ऋषि कौन से हैं, यह अन्वेषणीय है ।

विभिन्न ऋषियों की विशेषताएं : वैदिक साहित्य में सार्वत्रिक रूप से वसिष्ठ, भरद्वाज, जमदग्नि आदि ७ ऋषियों की विशेषताओं का वर्णन मिलता है जिसे भविष्य में समझने की आवश्यकता है । उदाहरण के लिए, तैत्तिरीय संहिता ३.५.२.१ के अनुसार ऋषि इन्द्र( आत्मा ?) को प्रत्यक्ष रूप में नहीं देख पाए, लेकिन वसिष्ठ ने इन्द्र को देखा । भरद्वाज के विषय में लक्ष्मीनारायण संहिता आदि में उल्लेख आता है कि भरत के अयोध्या से वनगमन के संदर्भ में भरद्वाज - पत्नी त्रिवेणी ने भरत की सेना का सत्कार एक नए स्वर्ग की सृष्टि के द्वारा किया, उन्हें सभी भोज्य पदार्थ प्रस्तुत किए । वाल्मीकि रामायण के अनुसार राम के वन से अयोध्या लौटते समय भरद्वाज ने राम को वर दिया कि राम के मार्ग में जितने भी वृक्ष आएंगे, वह असमय ही फलित हो जाएंगे ( इसके अतिरिक्त भरद्वाज के प्रवृत्तिपरक व निवृत्तिपरक शिष्यों का भी उल्लेख आता है ) । ज्योतिष विज्ञान तथा इन्टरनेट पर श्री स्टीनर की व्याख्याओं के आधार पर यह संकेत मिलता है कि वृक्षों के लिए जो पका फल है, वह मनुष्य के लिए उसकी परामानसिक चेतना है । भरद्वाज का नाम भी भरद्वाज की उपरोक्त विशेषता को सार्थक करता है ( भरति वाजं अन्नं इति ) । लेकिन जैमिनीय ब्राह्मण के अनुसार भरद्वाज की कामना अपनी प्रजा के लिए ओज, बल प्राप्त करने की है और इस कारण उसकी प्रजा राज्यदण्ड भी देती है । इस कथन की उपरोक्त विशेषताओं के साथ संगति भविष्य में अन्वेषणीय है । बंगलौर के विद्वान् श्री शेषाद्रि का कथन है कि भरद्वाज के नाम में भ भोजन का, र किरणों का बोधक है । जमदग्नि के विषय में तैत्तिरीय संहिता ३.३.५.२ का कथन है कि भूत और भव्य ऋषियों से तिरोहित हो गए । जमदग्नि ने तप द्वारा उनका दर्शन किया और पृश्नि कामों का सृजन किया ( जैमिनीय ब्राह्मण के अनुसार जमदग्नि की कामना अपनी प्रजा को भूमानन्द प्राप्त कराने की है ) । गोतम के विषय में पुराणों में वर्णन आता है कि दुर्भिक्ष में जल का अभाव हो जाने पर गोतम ने कूप का खनन करके स्वयं व अन्य ब्राह्मणों के लिए जल को प्राप्त किया । जैमिनीय ब्राह्मण में गोतम की कामना अपनी प्रजा के लिए श्रद्धा प्राप्त करने की है । जब तक श्रद्धा प्राप्त नहीं होती, अश्रद्धा रहती है, तब तक व्यक्ति शूद्र रहता है । लगता है कि गोतम की विशेषता यही है कि वह जड प्रकृति को भी सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करने में समर्थ बना देना चाहता है । गोतम के नाम की सार्थकता भी यही है ( गो - तम: - जो अधिकतम सूर्य की किरण प्राप्त करने में समर्थ हो ) । गोतम गो रूपी ऊर्जा प्राप्त करके उससे व्यक्तित्व के मूलाधार में प्रवेश करना चाहता है । यही कूप का खनन है । इससे बहुत से लाभ होते हैं । गोतम की पत्नी अहल्या है जिसका उद्धार अन्त में राम द्वारा पादाङ्गुष्ठ के स्पर्श से होता है । योग में पादाङ्गुष्ठ का स्पर्श महत्त्वपूर्ण है ।

          तैत्तिरीय संहिता २.५.८.३ के अनुसार आर्द्र दारु में भी अग्नि उत्पन्न करना परुच्छेप ऋषि  की विशेषता है ।

प्रथम लेखन : २५-१२-२००६ई.

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